जिस कवि की कविता पीएम मोदी को पसंद है वो कवि एक्सपोज़ इंडिया पर

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अमर भारती के स्थापना दिवस पर काव्य रस में सराबोर मीडिया हाऊस

साहित्यिक प्रसार के लिए हुआ ‘काव्य भारती’ चैनल का शुभारम्भ

बाजारे नुमाईश में मैं किरदार संभालूं घर बार संभालूं या तेरा प्यार संभालूं। उक्त पंक्तियां हैं प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय गजलकार दीक्षित दनकौरी की, जिसे उन्होंने रविवार को मीडिया हाऊस में ‘अमर भारती’ के 15वें स्थापना दिवस तथा यू.ट्यूब चैनल ‘काव्य भारती’ के शुभारम्भ के अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कही। समूचे माहौल को खुशनुमा करते हुए उन्होंने पश्चिमी सभ्यता को अपना रही वर्तमान पीढ़ी पर कटाक्ष करते हुए दीक्षित दनकौरी ने आगे कहा कि तब्दील हुई जाती हैतहजीब खनन में, बुनियाद संभालूं या दीवार संभालूं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में पढ़ी गई अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए दनकौरी साहब ने कहा ‘‘खुलूसो मुहब्बत की खुशबू से तर है चले आइए से अदीबों का घर है न मांझी, न रहबर,  न हक में हवाएं है कश्ती भी जर्जर, यह कैसा सफर है।” इसी क्रम में उन्होंने सुनाया ‘‘अलग ही मजा है फकीरी का अपनाए ना पाने की चिन्ता ना खोने का डर है”। इस रचना ने ना सिर्फ तालियां बटोरी बल्कि जमकर वाहवाही लूटी।

इसके अलावा उनकी रचना ‘‘क्यूं मनाऊं उनको जो मुझसे खफा हैं। यह उनकी अदा है तो यह मेरी अदा है”। अंत में कार्यक्रम का समापन करते हुए अपनी रचना ‘‘ना चांद तारे ना रंगो बू चाहिए कुछ खिलौने नहीं मुझको तू चाहिए वो मिलेगा यकीनन मगर शर्त यह है आखिरी सांस तक जुस्तजू चाहिए” सुनाई तो उपस्थित श्रोतागण  भावविभोर हो गए।

इसके पूर्व कार्यक्रम का शुभारम्भ मां सरस्वती की बंदना व पुष्प अर्पण से हुआ तत्पश्चात समस्त कविगण का स्वागत शाल व स्मृति चिन्ह देकर अमर भारती समूह के समूह सम्पादक शैलेन्द्र कुमार जैन द्वारा किया गया।

घंटों चले इस कवि सम्मेलन में सबसे पहले युवा कवि विजय प्रकाश भारद्वाज ने अमर भारती हिन्दी दैनिक के स्थापना दिवस पर अपनी कविता के माध्यम से समूह सम्पादक को संबोधित करते हुए कहा कि आपके संघर्शों को स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। हास्य-व्यंग्य का माहौल पैदा करते हुए कवि सुनहरी लाल तुरन्त ने कुछ यों रचना पेश की…….बन्द पैकेट का माल बदल देते हैं, लोग बनते ही बड़े चाल बदल लेते हैं-हम तो सनम चार कदम आगे हैं, साल होता नहीं ससुराल बदल लेते हैं। देश में चल रही चुनावी चर्चा पर करारा व्यंग्य करते हुए सुनहरी लाल तुरन्त ने कहा कि जंगल के जीव चल पड़े-चुनाव आ गए हैं-नेता उछल पड़े चुनाव आ गए हैं, झण्डा किसी के हाथ तो डण्डा किसी के हाथ में-काया किसी के हाथ तो माया किसी के साथ।

जहां ऋतुराज फूलों से सूरज का करें अभिनंदन, बसंती वादियों में भी महकता हो जहां चंदन-जहां मां “ शारदे बहाए वीणा से स्वर गंगा, करूं उस पुण्य धरती को हजारों बार मैं वन्दन…..की ओजपूर्ण स्वरधारा बिखेरते हुए कवि मुसाफिर देहलवी ने कुछ यों इस्तकबाल किया……दिन के सूरज तुम्हें पथ दिखाते रहें, रात को चांद तारे रिझाते रहें-साल आते रहें साल जाते रहें, आप यूं सदा मुस्कुराते रहें। संचालन कर रहे कवि विनय विनम्र ने देशभक्ति से ओत-प्रोत रचनाओं से उपस्थितजनों को झूमने पर मजबूर कर दिया। अमर भारती के स्थापना दिवस पर उन्होंने कुछ यों अपनी रचना पेश की….रूके न विजयरथ, यह कामना हमारी-एक दो नहीं हजारों जन्मोत्सव मनाएं हम। इसके अलावा डॉ कृष्णकांत मधुर ने अपनी फिल्मी पैरोडी से उपस्थित लोगों को खूब गुदगुदाया।

अंत में मेहमानों को धन्यवाद देते हुए समूह सम्पादक “शैलेन्द्र जैन ने कहा कि  28 अप्रैल को अमर भारती के साप्ताहिक संस्करण को दैनिक स्वरूप में पहली बार लाया गया था उसके बाद तमाम अड़चनें उलझनें आती रहीं और अमर भारती प्रकाशन समूह निरंतर आगे बढ़ता रहा।

इस दौरान समूह व्यवस्थापक अक्षय कुमार जैन व प्रबन्ध सम्पादक देवनाथ भी मौजूद रहे।

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